छठ पूजा कब है, क्यों मनाया जाता है ?

नमस्कार दोस्तों, हिंदी अपडेट (Hindi Update) में आपका स्वागत हैं | आज हम इस पोस्ट में यह जानकारी हासिल करेंगे की “छठ पूजा कब है, यह क्यों मनाया जाता है ?” अगर आपको इसके बारे में जानना है तो हमारे इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़े | हम आपको अपने इस आर्टिकल के द्वारा इसके बारे में पूरी जानकारी प्रदान करेंगे |

छठ पूजा हिन्दू धर्म के लोगों के द्वारा मनाया जाने वाला बहुत बड़ा महापर्व है जिसे चार दिनों तक लगातार मनाया जाता है। यह पर्व प्रमुख रूप से भारत के बिहार, झारखंड एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है | छठ पर्व को छठ पूजा, छठ, डाला छठ, छठी माई, षष्ठी सूर्य एवं षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है। यह छठ पूजा का पर्व भगवान सूर्य को समर्पित है।

पौराणिक कथाओं एवं मान्यता के अनुसार छठी माता भगवान सूर्य की बहन हैं। छठ पूजा का पर्व खासतौर पर बिहार में बड़ी ही धूम धाम से मनाया जाता है। बिहार के लोग इसे अपना सबसे बड़ा पर्व मानते हैं और एक तरह से ये पर्व उनकी संस्कृति बन गया है। वहीँ इस लेख छठ पूजा क्यों मनाई जाती है के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करने के लिए आपको इसे पूरी तरह से पढ़ना होगा। तो फिर बिना देरी किये चलिए शुरू करते हैं छठ पूजा क्यों मनाया जाता है |

छठ पूजा क्या है?

हिन्दू धर्म के लोगों के द्वारा मनाया जाने वाला एक बहुत बड़ा पर्व है छठ पूजा। इस पर्व की धूम धाम बिहार में देखी जाती है। माना जाता है कि यह पर्व वैदिक काल से चला आ रहा है। छठ पूजा पर्व का उल्लेख रामायण एवं महाभारत में भी मिलता है अर्थात यह पर्व रामायण काल एवं महाभारत काल से चला आ रहा है।

छठ पूजा में मुख्य रूप से सूर्य की उपासना की जाती है। लेकिन बाकी हिन्दू पर्वों की तरह इसमें मूर्ति पूजा शामिल नहीं है। बिहार में हिन्दू धर्मावलंबियों के अलावा इस्लाम एवं अन्य धर्म के लोग भी मनाते हैं। इस पर्व के पीछे कुछ पौराणिक मान्यताएं हैं और इससे जुड़ी बहुत सी कथाएं भी प्रचिलित हैं।

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छठ पूजा की कहानी 

1.  छठ की कहानी

एक कथा के अनुसार- एक राजा प्रियव्रत हुए उनकी पत्नी मालिनी हुई। इस दंपति की कोई संतान नहीं थी। वह निः संतान ही अपना जीवन यापन कर रहे थे और पुत्र की कामना लिए नित्य प्रतिदिन दुखी रहा करते थे। जानकारी के अनुसार ऋषि कश्यप जो पुत्र कामेष्ठि यज्ञ के ज्ञाता थे। राजा ने उनसे प्रार्थना यह यज्ञ करवाने के लिए किया जिसपर ऋषि कश्यप पुत्रकामेष्ठि  यज्ञ करवाने को राजी हुए।

यज्ञ समापन के नौ महीने बाद रानी के गर्व से एक पुत्र का जन्म हुआ, किंतु वह पुत्र मृत पैदा हुआ। इससे दुखी होकर राजा प्रियव्रत आत्महत्या करने के लिए आतुर हुए। तभी एक देवी ने अकस्मात प्रकट होकर भगवान सूर्य व षष्ठी देवी की आराधना करने को कहा और उसके महत्व को भी बताया।सूर्यदेव अथवा देवी षष्ठी की पूजा करने से याचक व व्रती की मनोकामना पूर्ण होती है ऐसा कहते हुए देवी अंतर्ध्यान हो गई।

राजा ने यथाशीघ्र कार्तिक मास शुक्ल पक्ष षष्ठी के दिन पूजा-अर्चना पूरे विधि-विधान के साथ शुद्धता व स्वच्छता के साथ किया और राजा को पुनः पुत्र की प्राप्ति हुई। इस दिन से निरंतर षष्ठी देवी व सूर्य भगवान की आराधना पूरे विधि-विधान व स्वछता/शुद्धता के साथ किया जाने लगा।

2. छठ की दूसरी कहानी

भगवान राम और सीता के संदर्भ में है। जब राम वनवास पूरा कर अयोध्या लौटे आए तो उन्होंने अपनी भार्या सीता संग कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी के दिन भगवान सूर्य व षष्ठी देवी की आराधना की। उस दिन से जनसामान्य में यह पर्व माननीय हुआ और साधारण जनता ने इस पर्व का महत्व समझा और अपने पुत्र की कुशलता दीर्घायु आदि के लिए यह पर्व करने लगे।

3. छठ की तीसरी कहानी

महाभारत में ही एक वर्णन और मिलता है कि द्रोपदी अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य व दीर्घायु की कामना के लिए षष्ठी का व्रत किया करती थी। उनके परिजन सकुशल और दीर्घायु रहे, आपसी सौहार्द बना रहे इस कामना से प्रेरित होकर द्रोपदी यह व्रत किया करती थी।

छठ पूजा का इतिहास

छठ पूजा से जुड़ी हुई बहुत सी कहानियां प्रचिलित जो कि वैदिक काल, रामायण काल एवं महाभारत काल आदि से जुड़ी हुई है। इसीलिए छठ पूजा अर्थात सूर्य पूजा को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। आइए हम आपको छठ पूजा से जुड़ी हुई कुछ कहानियों से अवगत कराते हैं।

महाभारत काल की मान्यता के अनुसार छठ पूजा की शुरुआत महाभारत काल से ही हुई थी। कर्ण सूर्य भगवान के पुत्र थे और भगवान सूर्य में परम भक्त भी थे। माना जाता है कि कर्ण प्रतिदिन कई कई घंटों तक आधी कमर तक पानी में खड़े रहकर सूर्य को अर्घ्य देते थे और भगवान सूर्य के आशीर्वाद से ही वे महान योद्धा बने थे।

रामायण काल में एक मान्यता के अनुसार जब भगवान राम ने लंका में विजय हासिल कर लिया था उसके बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन भगवान राम एवं माता सीता ने सूर्योपासना एवं आराधना की और सप्तमी के दिन फिर से अनुष्ठान कर सूर्यदेव का आशीर्वाद प्राप्त किया था।

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छठ पूजा कब मनाया जाता है?

वर्ष भर में दो बार आता है छठ पूजा का पर्व। छठ पूजा का पर्व का हिंदी कैलेंडर के अनुसार कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है और दूसरा चैत्र माह की षष्ठी तिथि को आता है, लेकिन मुख्य रूप से कार्तिक मास की छठ पूजा का पर्व ही मनाया जाता है। छठ पूजा का पर्व हर वर्ष मनाया जाने वाला पर्व है।

छठ पूजा का पर्व इस दिन मनाने के पीछे बहुत सी पौराणिक मान्यताएं हैं और इस दिन से जुड़ी हुई बहुत सी कथाएं भी प्रचिलित हैं। छठ पूजा पर्व के अनुष्ठान बहुत कठोर माने जाते हैं। इसमें निर्जल व्रत से लेकर पानी में खड़े होकर सूर्य अर्घ्य देना आदि कार्य शामिल हैं जो कि इस पर्व में उपासक को करना होता है। पर्यावरणविदों के अनुसार भी छठ पूजा के पर्व को प्रकृति के अनुकूल माना गया है।

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छठ पूजा क्यों मनाया जाता है?

छठ पूजा का पर्व घर परिवार के सभी सदस्यों की सुरक्षा एवं स्वास्थ्य लाभ के लिए मनाया जाता है। इस दिन प्राकृतिक सौंदर्य एवं परिवार के कल्याण के लिए पूजा की जाती है। माना जाता है कि छठ पूजा करने से परिवार में सुख समृद्धि बानी रहती है एवं मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

कुछ महिलाएं पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए और पुत्र के कुशल मंगल रहने की कामना को लेकर इस दिन व्रत रखती हैं। वैंसे तो इस दिन स्त्री एवं पुरुष दोनों ही लगभग समान रूप से व्रत रखते हैं। पुरुष भी अपने मनवांछित फल प्राप्ति के लिये इस कठोर व्रत को रखते हैं। रोगी या फिर रोगी परिवारजन रोग से मुक्ति पाने के पाने के लिए छठ पूजा करते हैं।

छठ पूजा की विधि

छठ पर्व में सबसे मुख्य होता है छठ व्रत और यह व्रत बहुत कठिन होता है। यह पर्व चार दिनों तक लगातार मनाया जाता है और इसकी शुरुआत कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से माना जाता है।

पहले दिन सेंधा नमक और घी से बना हुआ अरवा चावल और कद्दू की सब्जी को प्रसाद के तौर पर खाया जाता है फिर अगले दिन से व्रत की शुरुआत होती है।

दूसरे दिन बिना अन्न जल ग्रहण किये व्रत रखना होता है और शाम गुड़ या गाने के रस व चावल से बनी खीर एकांत में ग्रहण करना होता है उसके बाद इसे घर के सभी सदस्यों को प्रसाद के तौर पर वितरित किया जाता है। षष्टी तिथि के दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और अंतिम दिन सप्तमी को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा है।

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छठ पूजा का महत्व

पौराणिक दृष्टिकोण से ही बस नही वरन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी माना गया है छठ पूजा का महत्व। छठ पूजा पर विशेषतौर पर भगवान सूर्य की आराधना की जाती है। सूर्य की किरणों को काफी ज्यादा लाभदायक माना गया है। छठ पूजा के पर्व में भी प्राकर्तिक वस्तुओं का ही उपयोग होता है जैंसे बांस, प्राकर्तिक फल-फूल, गन्ने का रस आदि।

छठ पूजा का व्रत प्राकर्तिक सौंदर्य व स्वास्थ्य लाभ के लिए रखा जाता है। माना जाता है कि महिलाएं पुत्र रत्न की प्राप्ति व पुत्र के कुशल मंगल रहने की कामना से इस व्रत को रखती हैं। छठ व्रत रखने से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी यह दिन विशेष माना जाता है।

छठ पूजा कैसे मनाया जाता है?

बिहार में छठ पूजा का पर्व मुख्य रूप से मनाया जाता है। बिहार में इस पर्व को बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता है। छठ पूजा पर्व का प्रमुख हिस्सा छठ व्रत है। छठ व्रत में बिना अन्न जल ग्रहण करे रहना, सूर्य को कमर तक पानी में खड़े होकर अर्घ्य देना, एकांत में प्रसाद ग्रहण करना, साफ सफाई का विशेष ध्यान रखना आदि कठोर नियम शामिल है।

इस दिन सूर्य की दोनों पत्नियां उषा अर्थात सूर्योदय एवं प्रत्युषा अर्थात सूर्यास्त की पूजा भी की जाती है। बिहार में षष्ठी माता के लोकगीत बहुत प्रचिलित हैं। छठ पूजा की शुरुआत होती घरों एवं मंदिरों से छठ माता के लोकगीतों की गूंज सुनाई पड़ने लगती है। छठ पूजा बिहार की परम्परा बन चुकी है।

2022 में छठ पर्व कब है ?

2022 में छठ पर्व का त्यौहार का प्रथम अर्घ सायं 30 अक्टूबर रविवार और द्वितीय अर्घ प्रातः 31 अक्टूबर सोमवार को दिया जायेगा | 

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निष्कर्ष (Conclusion)

हमने इस पोस्ट में आपको “छठ पूजा कब है, यह क्यों मनाया जाता है ?” के बारे में विस्तार से बताया | मुझे उम्मीद है की आपको मेरा यह लेख जरूर पसंद आया होगा | अगर आपके मन में इस Article को लेकर कोई भी Doubts है या आप चाहते है की इसमें कोई सुधार हो तो आप हमें नीचे दिए Comment करके बता सकते हैं | जहाँ पर आपकी परेशानी को हल करने की कोशिश हमारी पूरी टीम करेगी | अगर आपको हमारा पोस्ट पसंद आया तो आप हमारी इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा Social Media पर Share भी कर सकते हैं |

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Snehil Goyal

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